Friday, August 5, 2011

नई तकनीक के द्वारा धान के छिलके से बनाई जायेगी बिजली : डॉ एन पी सिंह


प्रदीप आर्य  कुरुक्षेत्र
अक्षय ऊर्जा विभाग की तरफ से धान के छिलके से बिजली पैदा करने की नई तकनीक पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इस नई तकनीक के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए विभाग द्वारा आज होटल सैफरॉन में एक सेमीनार का आयोजन किया गया, जिसका उदघाटन भारत सरकार के अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के सलाहकार डा. एन.पी. सिंह ने किया।
              इस सेमिनार में भाग ले रहे कुरुक्षेत्र व कैथल जिलों के राईस मिल मालिक व अक्षय ऊर्जा विभाग के विशेषज्ञ को संबोधित करते हुए डा. एन.पी. सिंह ने कहा कि दिन पर दिन विकसित हो रही जीवन शैली, घरेलु प्रयोग तथा बढते औद्योगिक क्षेत्र के कारण ऊर्जा की निर्भरता बढती जा रही है। एक लाख करोड़ विदेशी मुद्रा ऊर्जा उत्पादन के लिए तेल आयात करने के लिए हर साल देश से बाहर जा रही है। भारत के पास प्राकृतिक स्रोतों का खजाना होने के बाद भी ऊर्जा उत्पादन के लिए हमें बाहर से तेल आयात करना पड़ता है।  हम उप प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग कर बाहर जाने वाली मुद्रा में कमी ला सकते हैं।
भारत कृषि प्रधान देश कहलाता है। कृषि में बहुत ही ऐसे स्रोत हैं जिन्हें हम कचरा समझ कर फैंक देते हैं, जबकि उनका पुन: प्रयोग कर बिजली का उत्पादन कर मंहगी होती जा रही बिजली की दरों में भी कटौती कर सकते हैं। पशु पालन होने के कारण हरियाणा के गांवों में गोबर भी प्रचुर मात्रा में होता है। गोबर गैस के प्लान्ट भी लगे होते हैं। बायोगैस का प्रयोग कर हम अपने स्तर पर छोटे छोटे यूनिट लगाकर बिजली उत्पादन में अपना सहयोग करें। राईस मिल मालिक धान के छिलके से बिजली उत्पादन के को-जनरेशन योजना के तहत काम करें। भारत सरकार के पास अच्छे कार्य के लिए वित्त की कोई कमी नहीं है।  
 सेमिनार की अध्यक्षता कर रही अक्षय ऊर्जा विभाग की मुख्य  परियोजना अधिकारी एवं अतिरिक्त उपायुक्त सुमेधा कटारिया ने बताया कि कि इन दोनों जिलों में 262 राईस मिल हैं, जिनकी धान से चावल निकालने की क्षमता 359 टन प्रति घंटा है, जो कि राज्य की धान निकालने की क्षमता का कुल 28 प्रतिशत है। अधिकतर राईस मिल पुरानी व पर परागत धान निकालने की परपरा स्टीम व बॉयलर का उपयोग कर रहे हैं। इससे प्रदूषण बढऩे के साथ-साथ बिजली की भी भारी मात्रा में खपत होती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए अक्षय ऊर्जा विभाग हरियाणा ने हरियाणा प्रदेश के कुरुक्षेत्र व आस-पास के जिलों कैथल, करनाल, जींद, यमुनानगर, अबाला, पानीपत में 15.5 मेगावाट क्षमता के सात को-जनरेशन प्रोजेक्ट लगाने की योजना बनाई है। इन बड़े प्रोजेक्टों के बारे में लोगों को जागरूक करने व नई तकनीक के उपयोग बारे बताने के लिए ही इस सेमीनार का मुख्य  उद्देश्य है।
                अक्षय ऊर्जा विभाग के परियोजना अधिकारी श्री बलवान सिंह गोलन ने बताया कि एक मेगावाट क्षमता के परियोजना लगाने पर साढे 4 करोड़ रुपए की लागत आती है, जिनमें से 20 लाख रुपए प्रति मेगावाट की सब्सिडी दी जाती है। उन्होंने बताया कि हरियाणा एक कृषि प्रधान प्रदेश है, जहां ऊर्जा को बचाने के लिए ऐसी नई तकनीक के उपयोग की भरपूर संभावनाएं हैं। धान के छिलके से व अन्य फसलों के अवशेषों से ऐसी ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। ऐसे प्रोजेक्टों से भाप व बिजली बनाने में मदद ली जा सकती है।  1970 में बिजली की समस्या को देखते हुए विभिन्न उद्योगों को ऊर्जा को बचाने के लिए नई तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देने की जरुरत महसूस की गई।
                उन्होंने बताया कि को-जेनरेशन न केवल बिजली की बचत में लाभकारी तकनीक साबित हुई है, बल्कि इससे पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में भी मदद मिली है। जिला के पिहोवा उप-मंडल के गांव बाखली में मैसर्ज सैंसन पेपर इंडस्ट्री में 3 मेगावाट क्षमता का ऐसा ही प्रोजेक्ट नवबर 2009 में 16 करोड़ 21 लाख रुपए की लागत से लगाया गया था। अक्षय ऊर्जा मंत्रालय भारत सरकार ने इस परियोजना के लिए 60 लाख रुपए की केंद्रीय सहायता उपलब्ध करवाई थी। यह परियोजना सफलता पूर्वक कार्य कर रही है। सेमीनार में अक्षय ऊर्जा विभाग के वरिष्ठ तकनीकी प्रबंधक पीके नोटियाल राईस मिल ऐसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील जैन, जिला खाद्य आपूर्ति नियंत्रक प्रमोद शर्मा, मैसर्ज सोल्युशन कलकता के अभिजीत बिशाई, डा. ए के धुसा, एम डी आदेश अग्रवाल, सैंसन पेपर इंडस्ट्री के जीएम एस के साहा ने अपने विचार रखे।

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