भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 के युद्ध में दुश्मन के विमानों की बमबारी का मुकाबला करने वाले सेना के जीप चालक अन्ना हजारे जब स्वैच्छिक सेवानिवृति के बाद अपने गाव लौटें थे तब उनका लक्ष्य भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ना नहीं था, लेकिन इस आदोलन के वह सबसे मुखर व्यक्ति बन गए हैं।
हजारे उन युवकों में शामिल थे, जो 1963 में सेना में शामिल हुए। भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वह खेमकारन सेक्टर में तैनात थे, जहा पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने भारतीय मोर्चे पर बमबारी की। उन्होंने अपने साथियों को वहा शहीद होते देखा, जिसके चलते उन्होंने अविवाहित रहने का फैसला किया।
सेना में 1960 में वाहन चालक के पद पर रहने के दौरान उन्होंने स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाधी और आचार्य विनोबा भावे के बारे में काफी अध्ययन किया। सेना में 15 साल की सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर वह 1975 में अपने गाव रालेगनसिद्धी लौट आए। उन्हें अपने गाव में सूखा, गरीबी, अपराध और मद्यपान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
उन्होंने ग्रामीणों को नहर बनाने और बाध बनाकर पानी का संग्रह करने में मदद करने के लिए प्रेरित किया, ताकि गाव में सिंचाई की संभावनाएं बढ़ सकें। साक्षरता कार्यक्रम भी चलाए गए, जिससे उनके गाव को एक आदर्श गाव बनने में मदद मिली। इस प्रयोग ने उन्हें देश भर में मशहूर कर दिया। उस वक्त उनका सामना महाराष्ट्र के वन विभाग के अधिकारियो के भ्रष्टाचार से हुआ। वह पुणे के नजदीक अलंदी में भूख हड़ताल पर बैठ गए। उनके आदोलन ने शासन को हिला कर रख दिया और आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई। उन्होंने 1991 में 'भ्रष्टाचार विरोधी जन आदोलन' का गठन किया जिसका धीरे-धीरे राज्य में प्रसार हो गया।
उन्होंने 1997 में सूचना का अधिकार की माग करते हुए अभियान चलाया, जिसके चलते महाराष्ट्र सरकार को इस बारे में एक कानून बनाना पड़ा। आगे चलकर केंद्र ने भी 2005 में इस कानून की तर्ज पर सूचना का अधिकार कानून बनाया। हजारे अपने गाव के यादवबाबा मंदिर से लगे एक छोटे से कमरे में रहते हैं। हजारे ने केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को भ्रष्ट कह दिया, जिसपर पवार ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गठित मंत्री समूह को छोड़ दिया। उन्होंने पिछले तीन दशक में महाराष्ट्र के राजनीतिक प्रतिष्ठान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, उनके आदोलन के चलते शिवसेना-भाजपा और काग्रेस-राकापा की सरकार के मंत्रियों को इस्तीफा तक देना पड़ गया। महात्मा गाधी के बाद हजारे उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने आमरण अनशन को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में आठ बार आमरण अनशन किया है। वर्ष 1995 में हजारे के आमरण अनशन से महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा सरकार के कैबिनेट के दो मंत्रियों को अपने पद से हाथ धोना पड़ गया।
हजारे ने काग्रेस-राकापा शासन को भी नहीं बख्शा। इस सरकार के चार मंत्रियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए वह आमरण अनशन पर चले गए। भ्रष्टाचारियों के खिलाफ उनके अभियान ने उनके लिए कई दुश्मन भी पैदा कर दिए। वर्ष 2009 में काग्रेस नेता पवनराजे निम्बालकर की हत्या के आरोप में गिरफ्तार दो लोगों ने बताया कि उन्हें हजारे की हत्या की सुपारी मिली थी। उनके परिवार में सिर्फ दो शादीशुदा बहनें हैं। एक मुंबई में रहती हैं, जबकि दूसरी अहमदनगर जिले में रहती हैं। उनकी मां लक्ष्मी बाई का 2002 में निधन हो गया था।
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