23 वे बलिदान दिवस पर विशेष
सुरेश अनेजा /विजय कम्बोज
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा|
कवि द्वारा लिखी ये पंक्तियाँ किसी भी कौम के शहीद के लिए अपने वतन पर जान न्योछावर कर देने वाले पर सही साबित होती है|अपने लिए तो हर कोई जीता है पर वतन पर शहीद होने वाले विरले ही होते हैं|आज से 63 साल पहले देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था|नेताजी सुभाष चन्द्र बोस,लाला लाजपत राय,शहीद भगतसिंह ,राजगुरु,सुखदेव,उधम सिंह,महात्मा गाँधी जैसे महानायकों ने देश को इन जंजीरों से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया और शहीद हो गये|इन्ही देशभक्तों की कुर्बानी की बदोलत आज हम स्वतंत्र भारत में खुली हवा में साँस ले रहे हैं|देश को निरंतर एक उन्नत देश बनाने की कोशिश कर रहे हैं|आज का भारत विश्व स्तर पर अपनी एक विशेष पहचान कायम कर चुका है|औद्योगिक स्तर पर भरत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है|लेकिन पड़ोसी मुल्क हमारी इस लोकप्रियता को खपा नही पा रहे हैं|वे भारत में आतंक का माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं|इस समय भारत के कई राज्यों पंजाब,हरियाणा और जम्मू कश्मीर आदि में आतंकवाद ने पांव पसारे हुए हैं|जम्मू कश्मीर में तो हालत खस्ता हैं|आये दिन कोई न कोई आतंकी घटना सुनने में आती रहती है|जिसने भी आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई को दबा दिया गया|राजनितिक रूप से बातचीत के जरिये भी आतंकवाद को दबाने का प्रयास किया गया|हजारों पुलिस सिपाही,सेना के जवान,पुरुष,स्त्रियाँ,बच्चे और युवा इस आतंक की भेंट चढ़ चुके हैं|पता नही कितने नौजवान आतंकियों के बहकावे में आकर आतंक का रास्ता अपना चुके हैं|यहाँ तक कि आतंक के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली देश कि प्रथम महिला प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी को भी आतंकियों ने सरेआम गोलियों से भून दिया था |हरियाणा के एक सिख परिवार ने भी आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई थी|इस परिवार के सदस्यों में देशभक्ति कि भावना और अटूट साहस कूट कूट कर भरा हुआ था|इस परिवार के मुखिया डॉ.हरनाम सिंह ने उस समय के प्रमुख आतंकी जरनैल सिंह भिंडरावाला के खिलाफ आवाज़ बुलंद की थी|वे लोगों को भी आतंक के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करते रहते थे|लेकिन जल्दी ही वे आतंकियों की आँखों की किरकिरी बन गये थे|23 मार्च 1988 को शाहाबाद की अनाज मंडी में आयोजित एक जलसे में उस समय कम्युनिस्ट पार्टी के इस विधायक ने जरनैल सिंह के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते हुए उसे गुरु का सिख नही बल्कि आतंकियों का सरगना बताया|इस तरह खुलकर विरोध होने से आतंकी तिलमिला उठे|
9 अप्रैल 1988 को डॉ.हरनाम सिंह को जान से मारने के उदेश्य से आतंकियों ने रात के करीब 8 बजे उनके घर पर हमला बोल दिया|ये हमलावर जोकि संख्या में पांच थे हथियारों से पूरी तरह लेस थे| योजनानुसार पहले दो आतंकियों ने घर का दरवाज़ा खटखटाया| डॉ. हरनाम सिंह उस समय बरामदे में बैठे थे| उन्होंने दरवाज़ा खोला तो सामने खड़े लोगों के हाथों में रिवाल्वर देखी|उनमे से एक ने पूछा कि डॉ.साहब घर में हैं|तभी पीछे से दुसरे ने आवाज़ देकर कहा कि यही हैं डॉ.हरनाम सिंह इन्हें गोली मार दो|इतना सुनते ही डॉ.हरनाम सिंह आतंकियों से भिड गये|जब उनकी पत्नी जसवंत कौर ने अपने पति को उनसे लड़ते देखा तो उन्होंने हिम्मत दिखाते हुए दोनों आतंकियों को बालों से पकड़ कर नीचे गिरा दिया और उनके उपर बैठ गयी| अचानक बाकी आतंकियों ने गोलीबारी करनी शुरू कर दी|इस गोलाबारी में दो गोलियां डॉ.हरनाम सिंह कि बाजू में लगी और चार गोलियां उनकी पत्नी को पेट में लगी|इतना कुछ होने पर भी उन्होंने आतंकियों को नही छोड़ा|गोलीबारी की आवाज़ सुनकर डॉ. हरनाम सिंह का बड़ा बेटा खुशदेव सिंह,उसकी पत्नी गुरप्रीत कौर और उनके साले का बेटा गुरदीप सिंह भी बाहर आ गये और आतंकियों से भिड गये| इस भिडंत में गुरदीप सिंह की गोलियां लगने से मौके पर ही मौत हो गयी|जबकि खुश देव सिंह और उसकी पत्नी ने आतंकियों को पकड़े रखा और घसीटकर बाहर गली में ले आये|तभी मेनगेट पर खड़े आतंकी ने गोलीबारी शुरू कर दी|इस गोलीबारी में गोलियां लगने से खुशदेव सिंह और उसकी पत्नी की मौके पर ही मौत हो गयी जबकि डॉ. हरनाम सिंह और उनकी पत्नी गम्भीर रूप से घायल हो गये|इस घटने के वक्त डॉ.हरनाम सिंह का छोटा बेटा किरतपाल सिंह घर पर नही था|खबर मिलते ही वह आया और अपने माँ बाप को अस्पताल ले गया|कुछ समय के बाद पुलिस भी आ गयी|जिन आतंकियों को डॉ.हरनाम सिंह और उनकी पत्नी ने पकड़ रखा था की भी गोलीबारी में मौके पर ही मौत ही गयी थी|जबकि दूसरे आतंकी अपने हथियार छोडकर भाग गये थे|
इस घटनाक्रम ने पूरे प्रशासन को हिला कर रख दिया था| 10 अप्रैल 1988 को डॉ.हरनाम सिंह के बेटे,बहू और साले के बेटे का अंतिम संस्कार कर दिया गया,जिसमे हजारों की संख्या में जनसमूह और सरकारी अधिकारीयों ने श्रधासुमन अर्पित किये|इस तरह बिना हथियारों के बहादुरी से आतंकियों का मुकाबला करने पर हरियाणा सरकार ने भारत सरकार से इस परिवार को शौर्य चक्र देने की अपील की|इस अपील को स्वीकार करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति आर.वेंकटरमन ने डॉ,हरनाम सिंह और उनकी पत्नी को शौर्य चक्र से नवाज़ा|जबकि उनके बेटे,बहू और साले के बेटे को मरनोपरांत शौर्य चक्र प्रदान किया गया|बहादुरी की ये मिसाल पूरे देश के लिए अनुकरणीय है|उस समय के हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल ने इस परिवार के शहीदों के नाम पर शाहाबाद में एक पार्क और शहीद स्मारक बनाने की घोषणा भी की|डॉ.हरनाम सिंह को सरकारी सुरक्षा भी प्रदान की गयी|लेकिन शहीदों की याद में घोषित पार्क व् शहीद स्मारक वाली घोषणा केवल कागजों तक ही सिमिट रह गयी है|जबकि डॉ.हरनाम सिंह खुद उस समय शाहाबाद से कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक थे|
डॉ.हरनाम सिंह ने हरियाणा सरकार से अपने छोटे बेटे किरत पाल सिंह को पुलिस विभाग में पद पर नियुक्त करने की अपील की|तो सरकार ने उसे इंस्पेक्टर के पद पर नियुक्त कर दिया|आज वे इन्द्री डीएसपी के पद पर कार्यरत हैं|इनमे भी देशभक्ति की भावना और अटूट साहस कूट कूट कर भरा हुआ है|उन्होंने देश के कई सवेंदनशील इलाकों में बड़ी बहादुरी से आतंकियों का मुकाबला करते हुए अपना कर्तव्य निभाया|ये इलाके देश में आतंकियों के गढ़ माने जाते हैं| डी एस पी किरतपाल सिंह पुलिस विभाग में बहादुर अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं| सरकार को चाहिए की वह ऐसे बहादुर सिपाही को राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित करे और उच्च पद पर पदोन्नति दे|
वर्तमान हरियाणा सरकार जहाँ एक ओर स्वतंत्रता सेनानियों एवं आतंक के खिलाफ लड़ने वालों सम्मान ओर सुरक्षा देने की बात कहती है वहां दूसरी ओर शाहाबाद के इस बहादुर परिवार की सुरक्षा को वर्तमान सरकार द्वारा हटा दिया गया है|इस परिवार को शौर्य चक्र से नवाज़ा जाना पूरे हरियाणा के लिए गौरव की बात है|सरकार को चाहिए की वह इस परिवार की शहादत को सम्मानित करे ओर की गयी घोषणाओं को पूरा करे|

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