Thursday, June 16, 2011

ईश्वर बिम्ब है, और जीव उसका प्रतिबिम्ब है:आचार्य भगवतीप्रसाद शुक्ल



रादौर,16 जून-विजय काम्बोज
श्री गंगा दशहरा के पावन पर्व पर श्री शिवमन्दिर गुमथला राव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा पर प्रवचन करते हुए आचार्य पं० भगवती प्रसाद शुक्ल ने बताया कि ईश्वर बिम्ब है, और जीव उसका प्रतिबिम्ब है । जिस प्रकार दर्पण के सामने बिम्ब पर कोई चीज लगाई गई तो प्रतिबिम्ब को अपने आप प्राप्त होती है। परमात्मा को किसी चीज की आवश्यकता नही है, परन्तु वह ग्रहण करता है जिससे जीव को कई गुना मिले। कथा के तीन सिद्धांत है, श्रवण, मनन और निदिध्यासन। पहले हम कथा को श्रवण करें फिर एकांत में बैठकर उसका मनन करें। और फिर अपने जीवन में उतारें। इसी में मानव जीवन का कल्याण है। 
श्री शुक्ल ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण की प्रत्येक लीला में सौन्दर्य एवं ऐश्वर्य दोनो है। जैसे पूतना का स्तनपान करने में भगवान का सौन्दर्य है एवं उसको मारने में भगवान का ऐश्वर्य है। काली नाग को नाथने में ऐश्वर्य है। एवं नाग के फन के ऊपर भगवान का नृत्य करना सौन्दर्य है।उन्होने कहा कि जरासंध का मतलब रोग है। यह रोग मथूरा रूपी शरीर के  ऊपर कई बार धावा बोलता है। किन्तू जब तक शरीर जवान होता है। इस जरासंध रूपी रोग को मारकर भगा देता है किन्तू जब वृद्ध अवस्था में रोग अपने साथ में काल यवन रूपी काल को लेकर आए तब गोबिन्द यानि जीव का यही कर्तव्य है कि वह मथुरा रूपी शरीर से मोह त्याग कर द्वारिका का निर्माण कर लें। इसी से इसके  जीवन का कल्याण है। इस अवसर पर हजारों लोगों ने कथा का रसपान किया एवं शिव मन्दिर कमेटी ने सबका धन्यवाद किया। मदन लाल शर्मा प्रधान, पं० सुमेर चन्द शर्मा, पं० बसन्त शास्त्री, सतप्रकाश शर्मा, बाबा शम्भूमुनी, पं० रूप कुमार, पं० अनित शास्त्री आदि ने  कथा मे अपनी सेवायें दी।

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